Elegy Of Light And Shadow

Chapter 3

राख

घर ने जाना कि साँस विहीन शरीर होना क्या होता है।

अँधेरा वफ़ादार रहा था। ऐसी वफ़ादारी जो कुछ नहीं माँगती। ऐसी जो एक कमरे को भर देती है और जब कमरा ठंडा हो जाता है तो छोड़ती नहीं। वह ऐसे ही टिका रहा जैसे नदी के तल में पत्थर टिका रहता है। धारा आगे बढ़ जाए। पत्थर वहीं रहता है। और घर को उस निरंतरता की ज़रूरत महसूस होने लगी थी। इसलिए नहीं कि उसने घाव भरे। बल्कि इसलिए कि उसने सुन्न कर दिया।

लेकिन आराम और उसके बाद जो आया, उसमें फ़र्क़ था। घर ने इसे वैसे ही महसूस किया जैसे एक पेड़ अपने मर्म में पाले को घुसते हुए महसूस करता है। न एक डाल में। न एक जड़ में। हर जगह एक साथ, जब तक कि ठंड और लकड़ी एक ही चीज़ न बन जाएँ और आप यह न बता पाएँ कि एक कहाँ ख़त्म होता है।

धूल परतों में आई। पहले सबसे महीन गाद जितनी पतली। फिर मोटी। फिर और मोटी। एक भूरी परत जिसने हर कोने को धुंधला कर दिया, जब तक कि कमरे अब कमरे नहीं रहे, बल्कि कमरों की सबसे धुंधली याद बन गए। दीवार पर हाथ का निशान उसमें समा गया। दरवाज़े के पास का चेहरा अपनी ही स्थिरता के नीचे ग़ायब हो गया। सीट पर रखा मुकुट उसके नीचे की लकड़ी में मिल गया, जब तक कि वस्तु और सतह एक न हो गए और उन्हें अलग करना असंभव हो गया। हर वह चीज़ जिसे रोशनी ने कभी दृश्यमान बनाया था, उसके बाद आने वाली चीज़ से धीरे-धीरे मिटाई जा रही थी।

मकड़ियों ने ऊपरी कोनों में अपने जाले बनाए। उनका काम ही एकमात्र निर्माण बचा था। उन्हें फ़र्शों को गर्मी बनाए रखने की ज़रूरत नहीं थी। उन्हें कमरों को जीवन की आवाज़ों से बोलने की ज़रूरत नहीं थी। उन्होंने कुछ नहीं माँगा और घर ने उन्हें सब कुछ दे दिया क्योंकि देना ही उसके पास बचा था।

लेकिन रोशनी नहीं लौटी।

न काँच से। न दरवाज़े के नीचे से। न उन जगहों से जहाँ फ़्रेम दीवार से अलग होने लगा था, वैसे ही जैसे एक शरीर दूसरे शरीर से अलग होता है जब पकड़ आपसी नहीं रहती। घर ने लकड़ी के धैर्य के साथ इंतज़ार किया। धरती में जमे पत्थर की ज़िद के साथ।

लेकिन रोशनी कहीं और थी। दूसरे फ़र्शों पर पड़ रही थी। दूसरी धूल ढूँढ रही थी। उसने इस घर को वैसे नहीं सँभाला जैसे घर ने उसकी याद को सँभाला था। रोशनी की कोई याददाश्त नहीं थी। यही घाव था। रोशनी आगे बढ़ गई और घर उसका पीछा नहीं कर सका।

अकेलापन इस जानकारी में रहता था। कि कहीं रोशनी ईमानदार और गर्म थी और उन कमरों को भर रही थी जो ये कमरे नहीं थे। कि वह उन सतहों को छू रही थी जो ये सतहें नहीं थीं। और यह दरवाज़ा ऐसे बंद था जिसका तालों से कोई लेना-देना नहीं था। हाथों से कोई लेना-देना नहीं था। बस वैसे ही बंद था जैसे एक गला उस आवाज़ के चारों ओर बंद हो जाता है जिसे बनाया नहीं जा सकता।

घर को दर्द हुआ। वैसे नहीं जैसे लकड़ी को सड़ने पर दर्द होता है। वैसे नहीं जैसे नींव को दरार पड़ने पर दर्द होता है। एक गहरा दर्द। एक ऐसे शरीर का दर्द जो अभी भी खड़ा है जब खड़े रहने का कारण दूर चला गया है और पीछे मुड़कर नहीं देखा। दीवारें दीवारें बने रहने के प्रयास से दुख रही थीं। छत छत बने रहने के प्रयास से आकाश के विरुद्ध खिंची हुई थी। और वह अँधेरा जो कभी सुकून था, कुछ और बन गया। कुछ भारी। घर उसे नाम नहीं दे सका। घर उसे केवल महसूस कर सका। होने का बोझ जब होने की अब ज़रूरत नहीं है।

फिर आग।

सूरज जैसी नहीं। न वह धार जो फ़र्श पर पड़ती है और हर सतह के बारे में सच बताती है। यह आग दीवारों के भीतर शुरू हुई। शायद वायरिंग में। किसी ऐसी चीज़ में जो कुंडली मारकर बैठी थी और इंतज़ार कर रही थी, जैसे दुख पसलियों में इंतज़ार करता है। बेसबोर्ड पर एक गर्माहट जिसे घर ने सूरज का भूत समझा। उस याद के लिए कि कभी छुआ जाना कैसा महसूस होता था।

घर उसमें झुक गया। अनैच्छिक रूप से। कृतज्ञता से। वैसे ही जैसे कोई भी जमी हुई चीज़ गर्मी की ओर बढ़ती है, यह जानते हुए भी कि गर्मी टिकेगी नहीं।

लेकिन आग वैसे नहीं रहती जैसे अँधेरा रहता है। आग आपके बगल में नहीं टिकती। आग खाती है। उसने पहले धूल ली। फिर परदे। फिर साल। फिर धैर्य। कमरे एक-दूसरे में सिमट गए जैसे कोई किताब के पन्ने पलट रहा हो जिसे कोई नहीं पढ़ रहा था। दीवारों ने अपनी हड्डियाँ छोड़ दीं। फ़र्श ने अपनी तख़्तियाँ छोड़ दीं। सीट पर रखा मुकुट पहले लौ बना और फिर राख और फिर कुछ भी नहीं।

कोई नहीं आया।

रास्ता लंबा था। रात विशाल थी। पड़ोसियों ने बहुत पहले ही इस घर को एक घर मानना छोड़ दिया था। उनके लिए यह एक आकृति थी। आकाश के विरुद्ध एक परछाई जिसे आँखें अब पहचानती नहीं थीं। आग तो बस पहले से लिखे गए हाशिये में अंतिम निशान थी।

घर ने आखिरी बार रोशनी महसूस की। अपनी खुद की रोशनी। चीड़ और सालों और बची हुई धूल से जन्मा एक नकली सूरज। उसने हर कमरे को असली सूरज से भी ज़्यादा पूरी तरह भर दिया। उसने हर सतह को छुआ। उसने वह जगह ढूँढी जहाँ हाथ का निशान था। फ़र्श पर घिसने के निशान। वे घिसी हुई जगहें जहाँ एक शरीर खड़ा रहा था, हिला था और इंतज़ार किया था। उसने दरवाज़े के पास का चेहरा ढूँढा और उससे भूरापन जला दिया और उसके नीचे कुछ भी नहीं था। नीचे हमेशा से कुछ भी नहीं था।

और एक साँस के लिए घर खाली नहीं था। एक साँस के लिए आग एक ऐसा शरीर थी जिसने हर कोने को भर दिया। हर कमरा। हर खामोशी।

लेकिन आग जो लेती है उसे रखती नहीं। आग देती है और देती है और फिर खुद को भी दे देती है। और जब यह ख़त्म हो गया तो अँधेरे को भी सँभालने के लिए कुछ नहीं बचा था। शांत रहने के लिए कुछ नहीं बचा था।

सुबह बिना किसी माफ़ी के आई। बिना किसी जागरूकता के। सूरज उस खुले मैदान में फैला जहाँ घर खड़ा था और उतरने के लिए कुछ नहीं मिला। न लकड़ी। न धूल। न देहलीज़।

वह कुछ देर नंगी नींव पर पड़ा रहा। फिर आगे बढ़ गया।